सुरेश वाडकर

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Thursday, July 7, 2016

मोदी मंत्रीमंडल में ब्राह्मण ही ब्राह्मण

मोदी मंत्रीमंडल में ब्राह्मण ही ब्राह्मण- सुनील यादव

जिसे राजनीति में जातिवाद कहा जाता है वह मूलतः जातियों का राजनीतिकरण है।- रजनी कोठारी

यह जातियों के राजनीतिकरण का ही परिणाम है कि किसी प्रदेश में होने वाले चुनाव से पहले वहाँ के जातीय समीकरण के अनुसार केंद्र में मंत्रीयों का चयन हो जाता है। रजनी कोठारी ने कहा था कि ''जिसे राजनीति में जातिवाद कहा जाता है वह मूलतः जातियों का राजनीतिकरण है।'' सबसे ज्यादा 'जातिवादी राजनीतिका रोना रोने वाले लोग यह कभी नहीं चाहते थे कि जातियों का राजनीतिकरण हो, क्योंकि जब जातियों का राजनीतिकरण नहीं हुआ था उस दौर में पिछड़े और दलितों के 300 घरों वाले गाँव में सिर्फ एक घर सवर्ण कितनी बार मुखिया बनता रहा। 

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यही स्थिति कमोवेश एमपी और एमएलए के चुनावों में भी रहती थी। यह ध्यान रहे जातियों के राजनीतिकरण ने ही मुट्ठी भर वर्चस्वशाली जातियों के एकाधिकार को तोड़ा और इस लोकतन्त्र में आम जनता की सक्रिय भागीदारी हुई। भारत में 90 प्रतिशत सवर्ण अपनी दोनों सवर्णवादी पार्टियों से जुड़े रहे/जुड़े हैं और तब तक राजनीति में जातिवाद नहीं था जब तक दलित पिछड़ो की राजनीतिक हिस्सेदारी नहीं थी। पर जैसे ही दलित पिछड़ो में राजनीतिक समझदारी आयी उन्होंने इस देश की लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में अपनी उपस्थिती दर्ज कराई वैसे ही एक नया मुहावारा वर्चस्वशाली समूहों ने उछाला 'जातिवादी राजनीति'। यह मुहावरा मीडिया में बैठे उन तमाम सवर्णों का है जिन्हें जातिवार जनगणना से जातिवाद बढ़ने का शातिराना खतरा नजर आता है। यह मुहावरा उन्हीं सवर्ण मीडिया वालों का है जिन्हें 90 प्रतिशत सवर्ण वोट लेकर लोकसभा चुनाव जीतने वाली भाजपा जातिवादी पार्टी नजर नहीं आती।  
मोदी मंत्रीमंडल की जन्‍मपत्री
गृहमंत्री : राजपूत
कृषि मंत्री : राजपूत
ग्रामीण विकास: राजपूत
रक्षा मंत्री : ब्राह्मण
वित्त मंत्री : ब्राह्मण
रेल मंत्री : ब्राह्मण
विदेश मंत्री : ब्राह्मण
शिक्षा मंत्री : ब्राह्मण
सड़क परिवहन मंत्री : ब्राह्मण
स्वास्थ्य मंत्री: ब्राह्मण
कैमिकल मंत्री : ब्राह्मण
पर्यावरण मंत्री : ब्राह्मण
खादी मंत्री : ब्राह्मण
कपड़ा मंत्री : ईरानी ब्राह्मण
स्टील मंत्री : जाट
क़ानून मंत्री : कायस्थ
संचार मंत्री : कम्मा(पिछड़ा)
खाद्य मंत्री : दलित
   
दरअसल जातियों के राजनीतिकरण के बाद जो पिछड़ा और दलित नेतृत्व उभरा उसमें से अधिकांश की समझदारी मानसिक गुलामी वाली थी। कुछ को छोड़ दें तो अधिकांश ने जिस वैचारिक एजेंडे पर अपनी राजनीति शुरू की थी। उसी का गला घोटते नजर आए। जैसा की वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश कहते हैं कि इन  दलितपिछड़े नेतृत्व ने कभी अपने समाज के पढे़-लिखे लोगों को महत्व नहीं दिया।’ यह कोई मामूली बात नहीं है। यह एक भयानक किस्म का सच है जो अपने इतिहास को दोहरा रहा है। वह इतिहास जिसमें संत साहित्य के क्रांतिकारी सामाजिक विचारों और न्याय की लड़ाई को तुलसीदास जैसे ब्राह्मण कवियों ने पूरी तरह खत्म कर देने कि कोशिश की। 

आज यही हो रहा है। सामाजिक न्याय की मसीहाई का दावा करने वाली अधिकांश पार्टियों ने अपने करीब एक सवर्ण अल्पजन की इस तरह की जमात खड़ी कर ली है जो अपने सुझाओ से इन पार्टियों को खत्म करने पर तुले हुए हैं। ये सवर्ण अल्पजन ही इन पिछड़े दलित नेताओं को सबसे बड़े वैचारिक साझेदार हैं। 

उर्मिलेश जी इसी बात को इस ढंग से कहते हैं कि जब कभी पढ़े-लिखों से वे कभी किसी वजह से 'निकटता या सहजता'महसूस करते हैं तो वे सिफ॓ उच्चवणी॓य पृष्ठभूमि वाले होते हैं. पिछडो़-दलितों में वे सिर्फ अपने लिए कुछ बाहुबलीधनबली अफसरान-इंजीनियर-ठेकेदारअदना पुलिस वालाप्रापर्टी डीलरतमाम चेले-चपाटीचापलूसफरेबी बाबा या जाहिल खोजते हैं. मजबूरी में कभी रणनीतिकारविचारकधन-प्रबंधकमीडिया मैनेजर या सम्मान देने के लिए किसी को खोजना होता है तो ऐसे लोगों को वे सिर्फ सवर्ण समुदायों से ही चुनते हैं.' कैबिनेट में एक ही जाति का वर्चस्‍व बनाए रखने के पीछे आखिर कौन-सी माया है
-सुनील यादव, लेखक

मोदी मंत्रीमंडल में ब्राह्मण ही ब्राह्मण

मोदी मंत्रीमंडल में ब्राह्मण ही ब्राह्मण- सुनील यादव

जिसे राजनीति में जातिवाद कहा जाता है वह मूलतः जातियों का राजनीतिकरण है।- रजनी कोठारी

यह जातियों के राजनीतिकरण का ही परिणाम है कि किसी प्रदेश में होने वाले चुनाव से पहले वहाँ के जातीय समीकरण के अनुसार केंद्र में मंत्रीयों का चयन हो जाता है। रजनी कोठारी ने कहा था कि ''जिसे राजनीति में जातिवाद कहा जाता है वह मूलतः जातियों का राजनीतिकरण है।'' सबसे ज्यादा 'जातिवादी राजनीतिका रोना रोने वाले लोग यह कभी नहीं चाहते थे कि जातियों का राजनीतिकरण हो, क्योंकि जब जातियों का राजनीतिकरण नहीं हुआ था उस दौर में पिछड़े और दलितों के 300 घरों वाले गाँव में सिर्फ एक घर सवर्ण कितनी बार मुखिया बनता रहा। 

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यही स्थिति कमोवेश एमपी और एमएलए के चुनावों में भी रहती थी। यह ध्यान रहे जातियों के राजनीतिकरण ने ही मुट्ठी भर वर्चस्वशाली जातियों के एकाधिकार को तोड़ा और इस लोकतन्त्र में आम जनता की सक्रिय भागीदारी हुई। भारत में 90 प्रतिशत सवर्ण अपनी दोनों सवर्णवादी पार्टियों से जुड़े रहे/जुड़े हैं और तब तक राजनीति में जातिवाद नहीं था जब तक दलित पिछड़ो की राजनीतिक हिस्सेदारी नहीं थी। पर जैसे ही दलित पिछड़ो में राजनीतिक समझदारी आयी उन्होंने इस देश की लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में अपनी उपस्थिती दर्ज कराई वैसे ही एक नया मुहावारा वर्चस्वशाली समूहों ने उछाला 'जातिवादी राजनीति'। यह मुहावरा मीडिया में बैठे उन तमाम सवर्णों का है जिन्हें जातिवार जनगणना से जातिवाद बढ़ने का शातिराना खतरा नजर आता है। यह मुहावरा उन्हीं सवर्ण मीडिया वालों का है जिन्हें 90 प्रतिशत सवर्ण वोट लेकर लोकसभा चुनाव जीतने वाली भाजपा जातिवादी पार्टी नजर नहीं आती।  
मोदी मंत्रीमंडल की जन्‍मपत्री
गृहमंत्री : राजपूत
कृषि मंत्री : राजपूत
ग्रामीण विकास: राजपूत
रक्षा मंत्री : ब्राह्मण
वित्त मंत्री : ब्राह्मण
रेल मंत्री : ब्राह्मण
विदेश मंत्री : ब्राह्मण
शिक्षा मंत्री : ब्राह्मण
सड़क परिवहन मंत्री : ब्राह्मण
स्वास्थ्य मंत्री: ब्राह्मण
कैमिकल मंत्री : ब्राह्मण
पर्यावरण मंत्री : ब्राह्मण
खादी मंत्री : ब्राह्मण
कपड़ा मंत्री : ईरानी ब्राह्मण
स्टील मंत्री : जाट
क़ानून मंत्री : कायस्थ
संचार मंत्री : कम्मा(पिछड़ा)
खाद्य मंत्री : दलित
   
दरअसल जातियों के राजनीतिकरण के बाद जो पिछड़ा और दलित नेतृत्व उभरा उसमें से अधिकांश की समझदारी मानसिक गुलामी वाली थी। कुछ को छोड़ दें तो अधिकांश ने जिस वैचारिक एजेंडे पर अपनी राजनीति शुरू की थी। उसी का गला घोटते नजर आए। जैसा की वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश कहते हैं कि इन  दलितपिछड़े नेतृत्व ने कभी अपने समाज के पढे़-लिखे लोगों को महत्व नहीं दिया।’ यह कोई मामूली बात नहीं है। यह एक भयानक किस्म का सच है जो अपने इतिहास को दोहरा रहा है। वह इतिहास जिसमें संत साहित्य के क्रांतिकारी सामाजिक विचारों और न्याय की लड़ाई को तुलसीदास जैसे ब्राह्मण कवियों ने पूरी तरह खत्म कर देने कि कोशिश की। 

आज यही हो रहा है। सामाजिक न्याय की मसीहाई का दावा करने वाली अधिकांश पार्टियों ने अपने करीब एक सवर्ण अल्पजन की इस तरह की जमात खड़ी कर ली है जो अपने सुझाओ से इन पार्टियों को खत्म करने पर तुले हुए हैं। ये सवर्ण अल्पजन ही इन पिछड़े दलित नेताओं को सबसे बड़े वैचारिक साझेदार हैं। 

उर्मिलेश जी इसी बात को इस ढंग से कहते हैं कि जब कभी पढ़े-लिखों से वे कभी किसी वजह से 'निकटता या सहजता'महसूस करते हैं तो वे सिफ॓ उच्चवणी॓य पृष्ठभूमि वाले होते हैं. पिछडो़-दलितों में वे सिर्फ अपने लिए कुछ बाहुबलीधनबली अफसरान-इंजीनियर-ठेकेदारअदना पुलिस वालाप्रापर्टी डीलरतमाम चेले-चपाटीचापलूसफरेबी बाबा या जाहिल खोजते हैं. मजबूरी में कभी रणनीतिकारविचारकधन-प्रबंधकमीडिया मैनेजर या सम्मान देने के लिए किसी को खोजना होता है तो ऐसे लोगों को वे सिर्फ सवर्ण समुदायों से ही चुनते हैं.' कैबिनेट में एक ही जाति का वर्चस्‍व बनाए रखने के पीछे आखिर कौन-सी माया है
-सुनील यादव, लेखक

Wednesday, July 6, 2016

जानिये किस किस कम्पनी ने लगाया है चुना देश को देशभक्ति के नाम पर : आर टी आई से खुलासा :: राज आदिवाल
26 Apr 2016
आप एक विजय माल्या की बात करते हैं.. मैं आपको बता दूँ अभी हाल में एक आरटीआई आवेदन के ज़रिये इस बात का खुलासा हुआ कि 2013 से 2015 के बीच देश के सरकारी बैंकों ने एक लाख 14 हज़ार करोड़ रुपये के कर्जे माफ़ कर दिये। इनमें से 95 प्रतिशत कर्जे बड़े और मझोले उद्योगों के करोड़पति मालिकों को दिये गये थे।

यह रकम कितनी बड़ी है इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि अगर ये सारे कर्ज़दार अपना कर्ज़ा लौटा देते तो 2015 में देश में रक्षा, शिक्षा, हाईवे और स्वास्थ्य पर खर्च हुई पूरी राशि का खर्च इसी से निकल आता।
इसमें हैरानी की कोई बात नहीं। पूँजीपतियों के मीडिया में हल्ला मचा-मचाकर लोगों को यह विश्वास दिला दिया जाता है कि अर्थव्यवस्था में घाटे के लिए आम लोग ज़िम्मेदार हैं क्योंकि वे अपने पूरे टैक्स नहीं चुकाते, बिल नहीं भरते, या शिक्षा, अस्पताल, खेती आदि में सरकारी सब्सिडी बहुत अधिक है, आदि-आदि। ये सब बकवास है। देश की ग़रीब जनता कुल टैक्सों का तीन-चौथाई से भी ज़्यादा परोक्ष करों के रूप में चुकाती है। मगर इसका भारी हिस्सा नेताशाही और अफ़सरशाही की ऐयाशियों पर और धन्नासेठों को तमाम तरह की छूटें और रियायतें देने पर खर्च हो जाता है। इतने से भी उनका पेट नहीं भरता तो वे बैंकों से भारी कर्जे लेकर उसे डकार जाते हैं।

ग़रीबों के कर्जे वसूल करने के लिए उनकी झोपड़ी तक नीलाम करवा देने वाली सरकार अपने इन माई-बापों से एक पैसा नहीं वसूल पाती और फिर कई साल बाद उन्हें माफ़ कर दिया जाता है। दरअसल इस सारी रकम पर जनता का हक़ होता है। करोड़ों लोगों की छोटी-छोटी बचतों से बैंकों को जो भारी कमाई होती है, उसी में से वे ये दरियादिली दिखाते हैं।
आइये अब ज़रा देखते हैं कि इन चोरों में से 10 सबसे बड़े चोर कौन हैं।

1. टॉप टेन में सबसे ऊपर हैं, अनिल अम्बानी का रिलायंस ग्रुप जो 1.25 लाख करोड़ रुपये का कर्ज़ दबाये बैठा है।
2. दूसरे नंबर पर है अपने कारखानों के लिए हज़ारों आदिवासियों को उजाड़ने वाला वेदान्ताल ग्रुप जिस पर 1.03 लाख करोड़ कर्ज़ है।
3. एस्सार ग्रुप पर 1.01 लाख करोड़ कर्ज़ है।
4. मोदी के खास अडानी ग्रुप ने बैंकों के 96,031 करोड़ रुपये नहीं लौटाये हैं। इसके बाद भी उसे 6600 करोड़ रुपये के नये कर्ज़ की मंजूरी दे दी गयी थी लेकिन शोर मच जाने के कारण रद्द हो गयी।
5. जेपी ग्रुप पर 75,163 करोड़ का ऋण है।
6. सज्जन जिन्दल (जो मोदी की पाकिस्तान यात्रा के समय वहाँ पहुँचे हुए थे) के जे.एस.डब्ल्यू. ग्रुप पर 58,171 करोड़ का कर्ज़ है।
7. जी.एम.आर. ग्रुप पर 47,975 करोड़ का ऋण है।
8. लैंको ग्रुप पर 47,102 करोड़ का ऋण है।
9. सांसद वेणुगोपाल धूत की कंपनी वीडियोकॉन पर बैंकों का 45,405 करोड़ का ऋण है।
10. जीवीके ग्रुप कुल 33,933 करोड़ दबाये बैठा है जो 2015 में मनरेगा के लिए सरकारी बजट (34000 करोड़) से भी ज़्यादा है।

डियर जनता आप अभी व्यस्त रहिये अपनी धर्म और जाति पात की गूढ़ ज्ञान गंगा में और अपने अपने नेताओं की जिंदाबाद मुर्दाबाद में लड़ते मरते रहिये आपस में.. देश और देश की संपत्ति का क्या है वो तो आपके यही महान नेता, धर्म गुरु और पूंजीपति मिल बाँट कर जल्द ही चट कर लेंग।.
बस आप अपनी देशभक्ति भारत माता की जय तक सिमित रखिये

भारत पिछड़कर 91वें स्थान पर पहुंच गया है।

भारत पिछड़कर 91वें स्थान पर पहुंच गया है।
जिनेवा स्थित विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) द्वारा आज जारी सालाना नेटवर्क्ड रेडिनेस इंडेक्स के अनुसार सिंगापुर इस सूची में एक बार फिर शीर्ष पर रहा है। वहीं खुद को डिजिटल अर्थव्यवस्था और समाज में बदलने की तैयारियों की वैश्विक सूची में भारत पिछड़कर 91वें स्थान पर पहुंच गया है। अन्य प्रमुख बाजारों में भी भारत पीछे है। रूस इस सूची में 41वें स्थान पर है। उसके बाद चीन पिछली बार से तीन स्थान चढ़कर 59वें, दक्षिण अफ्रीका 10 स्थान चढ़कर 65वें तथा ब्राजील 72वें स्थान पर है।
वहीं फिनलैंड दूसरे स्थान पर कायम है। इस सूची में शीर्ष दस स्थानों पर जो अन्य देश शामिल हैं उनमें स्वीडन, नॉर्वे, अमेरिका, नीदरलैंड, स्विट्जरलैंड, ब्रिटेन, लग्जमबर्ग तथा जापान हैं। यह इंडेक्स डब्ल्यूईएफ की वैश्विक सूचना प्रौद्योगिकी रिपोर्ट का हिस्सा है। इसमें विभिन्न देशों का आकलन डिजिटल अर्थव्यवस्था तथा समाज के लिए तैयारियों के आधार पर किया गया है।
यह लगातार चौथा साल है जबकि भारत इस सूची में नीचे आया है। 2015 में भारत 89वें स्थान पर था, 2014 में 83वें तथा 2013 में 68वें स्थान पर था। जहां राजनीतिक तथा नियामकीय वातावरण के हिसाब से भारत की स्थिति सुधरी है और वह 78वें स्थान पर रहा है लेकिन कारोबार तथा नवोन्मेषण वातावरण के हिसाब से भारत 110वें स्थान पर फिसल गया है।

इस मंदिर में तस्कर चढ़ाते हैं करोड़ों की अफीम

इस मंदिर में तस्कर चढ़ाते हैं करोड़ों की  अफीम
  चित्तौड़गढ़।राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में एक ऐसा मंदिर है, जहां चढ़ावे में लड्‌डू या प्रसाद नहीं बल्कि अफीम आती है। यह अफीम कोई और नहीं, बल्कि तस्कर चढ़ाते हैं। असल में यहां तस्कर मादक पदार्थों की ब्रिक्री और अच्छे मुनाफे की कामना के साथ आते हैं। जब हर अमास्वस्या को दानपेटी खोली जाती है तो करोड़ों रुपए का चढ़ावा निकलता है। निकले2.66 करोड़ रुपए…
- चित्तौड़गढ़ जिले के डूंगला तहसील के मंडफिया में है सांवलिया सेठजी का मंदिर।
- यह भगवान कृष्ण का मंदिर है। यहां कई सालों से तस्कर अफीम चढ़ा रहे हैं।
- इस मंदिर के प्रति लोगों की इतनी श्रद्धा है कि कोई सोना तो कोई चांदी भी चढ़ाता है।
- इस मंदिर में तस्कर हर साल करोड़ो का अफीम चढाते हैं। इस मंदिर की यह मान्यता है कि जो तस्कर यहां पर अफीम चढ़ाते हैं, उन्हें तस्करी के धंधे में अच्छा मुनाफा होता है।
- इस मंदिर की दानपेटी हर अमावस्या को खोली जाती है। जब भी इस मंदिर की दानपेटी को खोला जाता है, उसमें से कैश और जेवरात के साथ बड़े पैमाने पर अफीम भी निकलती है।
मन्नत भी ऐसी कि सुनने वाले के होश उड़ जाएं
- ये तस्कर जिस तरह की मन्नत मांगते हैं, उसकी कल्पना आमतौर पर भगवान के मंदिर में तो कम से कम कोई नहीं करता।
- कहा जाता है कि ये तस्कर यहां अवैध अफीम की डिलीवरी के सकुशल पहुंचने की मन्‍नत मांगते हैं।
- यही नहीं उस मन्नत के पूरा होने पर 50 से 100 ग्राम अफीम की पुड़िया चढ़ाते हैं।
- इस बार जब इस मंदिर की दानपेटी को खोला गया तो कुल 2.66 करोड़ रुपए निकले हैं। इसमें 68.30 ग्राम गोल्ड, 3 किलो 85 किग्रा चांदी निकली है।
- चूंकि अफीम ब्लैक गोल्ड के नाम से जाना जाता है और सांवलिया सेठ खुद काले सोने के देवता है।
- तस्कर अपने धंधे के मुनाफे में से बकायदा सांवलिया सेठ का हिस्सा भी निकालते हैं।
- काफी चढ़ावा चढ़ने के चलते सांवलिया जी को सेठ जी के नाम से जाना जाने लगा है
 
चित्तौड़गढ़। राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में एक ऐसा मंदिर है, जहां चढ़ावे में लड्‌डू या प्रसाद नहीं बल्कि अफीम आती है। यह अफीम कोई और नहीं, बल्कि तस्कर चढ़ाते हैं। असल में यहां तस्कर मादक पदार्थों की ब्रिक्री और अच्छे मुनाफे की कामना के साथ आते हैं। जब हर अमास्वस्या को दानपेटी खोली जाती है तो करोड़ों रुपए का चढ़ावा निकलता है। निकले2.66 करोड़ रुपए…
- चित्तौड़गढ़ जिले के डूंगला तहसील के मंडफिया में है सांवलिया सेठजी का मंदिर।
- यह भगवान कृष्ण का मंदिर है। यहां कई सालों से तस्कर अफीम चढ़ा रहे हैं।
- इस मंदिर के प्रति लोगों की इतनी श्रद्धा है कि कोई सोना तो कोई चांदी भी चढ़ाता है।
- इस मंदिर में तस्कर हर साल करोड़ो का अफीम चढाते हैं। इस मंदिर की यह मान्यता है कि जो तस्कर यहां पर अफीम चढ़ाते हैं, उन्हें तस्करी के धंधे में अच्छा मुनाफा होता है।
- इस मंदिर की दानपेटी हर अमावस्या को खोली जाती है। जब भी इस मंदिर की दानपेटी को खोला जाता है, उसमें से कैश और जेवरात के साथ बड़े पैमाने पर अफीम भी निकलती है।
मन्नत भी ऐसी कि सुनने वाले के होश उड़ जाएं
- ये तस्कर जिस तरह की मन्नत मांगते हैं, उसकी कल्पना आमतौर पर भगवान के मंदिर में तो कम से कम कोई नहीं करता।
- कहा जाता है कि ये तस्कर यहां अवैध अफीम की डिलीवरी के सकुशल पहुंचने की मन्‍नत मांगते हैं।
- यही नहीं उस मन्नत के पूरा होने पर 50 से 100 ग्राम अफीम की पुड़िया चढ़ाते हैं।
- इस बार जब इस मंदिर की दानपेटी को खोला गया तो कुल 2.66 करोड़ रुपए निकले हैं। इसमें 68.30 ग्राम गोल्ड, 3 किलो 85 किग्रा चांदी निकली है।
- चूंकि अफीम ब्लैक गोल्ड के नाम से जाना जाता है और सांवलिया सेठ खुद काले सोने के देवता है।
- तस्कर अपने धंधे के मुनाफे में से बकायदा सांवलिया सेठ का हिस्सा भी निकालते हैं।
- काफी चढ़ावा चढ़ने के चलते सांवलिया जी को सेठ जी के नाम से जाना जाने लगा है।

Sunday, May 15, 2016

महिला दिवस पर अपराध और अत्याचार के ये आंकड़े जानना जरूरी

महिलाओं के उत्पीड़नकर्ताओं के मन में सजा का भय ही नहीं है यही वजह है कि बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामलों में वृद्धि हो रही है. गौर करें तो बलात्कार के मामलों में सजा की दर बेहद कम है.

यह विडंबना है कि भारतीय समाज में जैसे-जैसे स्वतंत्रता और आधुनिकता का विस्तार हुआ, वैसे-वैसे महिलाओं के प्रति संकीर्णता का भाव बढ़ा है. प्राचीन समाज ही नहीं आधुनिक समाज की दृष्टि में भी महिलाएं मात्र औरत हैं और उन्हें थोपी व गढ़ी-बुनी गयी तथाकथित नैतिकता की परिधि से बाहर नहीं आना चाहिए. इसी मानसिकता का घातक परिणाम है कि महिलाओं के प्रति छेड़छाड़, बलात्कार, यातनाएं, अनैतिक व्यापार, दहेज मृत्यु तथा यौन उत्पीड़न जैसे अपराधों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है. यह स्थिति तब है जब देश में महिलाओं को अपराधों के विरुद्ध कानूनी संरक्षण हासिल है.
गौरतलब है कि भारतीय महिलाओं को अपराधों के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करने तथा उनकी आर्थिक तथा सामाजिक दशाओं में सुधार करने हेतु ढ़ेर सारे कानून बनाए गए हैं. इनमें अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956, दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961, कुटुम्ब न्यायालय अधिनियम 1984, महिलाओं का अशिष्ट-रुपण प्रतिषेध अधिनियिम 1986, गर्भाधारण पूर्व लिंग-चयन प्रतिषेध अधिनियम 1994, सती निषेध अधिनियम 1987, राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम 1990, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006, कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध, प्रतितोष) अधिनियम 2013 प्रमुख हैं.
इसके अलावा राजधानी दिल्ली में 16 दिसंबर, 2012 को हुई नृशंस सामूहिक बलात्कार की घटना के विरुद्ध राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित आक्रोश की पृष्ठभूमि में ‘दंड विधि (संशोधन) 2013 पारित किया गया और यह कानून 3 अप्रैल, 2013 को देश में लागू हो गया. इस कानून में प्रावधान किया गया है कि तेजाबी हमला करने वालों को 10 वर्ष की सजा और बलात्कार के मामले में अगर पीड़ित महिला की मृत्यु हो जाती है तो बलात्कारी को न्यूनतम 20 वर्ष की सजा होगी. इसके साथ ही महिलाओं के विरुद्ध अपराध की एफआईआर दर्ज नहीं करने वाले पुलिसकर्मियों को दंडित का भी प्रावधान है. इस कानून के मुताबिक महिलाओं का पीछा करने और घूर-घूर कर देखने को भी गैर जमानती अपराध घोषित किया है. साथ ही 15 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध बनाने को बलात्कार की श्रेणी में रखा गया है. लेकिन त्रासदी है कि इन कानूनों के बावजूद भी महिलाओं पर अत्याचार थमने का नाम नहीं ले रहा है. देश में घरेलू हिंसा, बलात्कार, कन्या भ्रुण हत्या, दहेज-मृत्यु, अपहरण और अगवा, लैंगिक दुव्र्यवहार और ऑनर किलिंग की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं.
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की हालिया रिपोर्ट से उद्घाटित हुआ है कि महिलाओं को सुरक्षा उपलब्ध कराने के बावजूद भी 2014 में प्रतिदिन 100 महिलाओं का बलात्कार हुआ और 364 महिलाएं यौनशोषण का शिकार हुई. रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में केंद्रशासित और राज्यों को मिलाकर कुल 36735 मामले दर्ज हुए. यह भी तथ्य उजागर हुआ है कि हर वर्ष बलात्कार के मामले में वृद्धि हुई है. यानी इसका मतलब यह हुआ कि महिला अत्याचार विरोधी कानून का खौफ नहीं है या यों कहें कि कानून का ईमानदारी से पालन नहीं हो रहा है.
आंकड़ों पर गौर करें तो बहुत कुछ स्पष्ट हो जाता है. आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2004 में बलात्कार के कुल 18233 मामले दर्ज हुए जबकि वर्ष 2009 में यह आंकड़ा बढ़कर 21397 हो गया. इसी तरह वर्ष 2012 में 24923 मामले दर्ज किए गए और 2014 में यह संख्या 36735 हो गयी. गौर करें तो 2014 का आंकड़ा वर्ष 2004 के मुकाबले दोगुनी है. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट पर गौर फरमाएं तो पिछले वर्ष के रिकार्ड के अनुसार महिलाओं के लिए मध्यप्रदेश सबसे अधिक असुरक्षित राज्य के रुप में उभरा है. पिछले वर्ष यहां सबसे अधिक 5076 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए. इसी तरह राजस्थान में 3759, उत्तरप्रदेश में 3467, महाराष्ट्र में 3438 और दिल्ली में 2096 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए. आमतौर पर राजनीतिकों द्वारा बिहार में जंगलराज की बात कही जाती है. लेकिन गौर करें तो यह राज्य महिलाओं की सुरक्षा के मामले में मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, राजस्थान और दिल्ली से बेहतर है. आंकड़ों से उजागर हुआ है कि 2014 में बिहार में बलात्कार के कुल 1127 मामले दर्ज हुए. आमतौर पर बलात्कार के कारणों में अशिक्षा को भी जिम्मेदार माना जाता है. लेकिन विडंबना है कि संपूर्ण साक्षरता के लिए जाना जाने वाला राज्य केरल में भी महिलाएं सुरक्षित नहीं. यहां पिछले वर्ष 1347 महिलाओं के साथ बलात्कार का मामला दर्ज किया गया.
महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से केंद्रशासित राज्य बेहतर हैं. रिपोर्ट के मुताबिक लक्षद्वीप महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से प्रथम और नगालैंड दूसरे स्थान पर है. इसी तरह दमन और दीव तथा दादर नगर हवेली भी महिलाओं के लिए सुरक्षित स्थान है. लेकिन गौर करें तो देश के अधिकांश राज्य महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील और असुरक्षित हैं.यहां ध्यान देने वाली बात यह भी कि महिलाएं सिर्फ सड़कों व सार्वजनिक स्थानों पर ही असुरक्षित नहीं है. बल्कि वह अपने घर-परिवार और रिश्ते-नातेदारों की जद में भी असुरक्षित हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो उद्घाटित कर चुका है रिश्तेदारों द्वारा बलात्कार किए जाने की घटनाओं में अप्रत्याशित रुप से वृद्धि हुई है. दुष्कर्म की घटनाओं में तकरीबन 95 फीसदी मामलों में पीड़ित लड़की दुष्कर्मी को अच्छी तरह जानती-पहचानती है फिर भी उसके खिलाफ अपना मुंह नहीं खोलती. शायद उसे भरोसा नहीं होता है कि कानून व समाज उसे दण्डित कर पाएगा.
यूनिसेफ की हालिया रिपोर्ट ‘हिडेन इन प्लेन साइट’ से उजागर हुआ है कि भारत में 15 साल से 19 साल की उम्र वाली 34 फीसद विवाहित महिलाएं ऐसी हैं, जिन्होंने अपने पति या साथी के हाथों शारीरिक या यौन हिंसा झेली हैं. इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 15 साल से 19 साल तक की उम्र वाली 77 फीसद महिलाएं कम से कम एक बार अपने पति या साथी के द्वारा यौन संबंध बनाने या अन्य किसी यौन क्रिया में जबरदस्ती का शिकार हुई हैं. इसी तरह 15 साल से 19 साल की उम्र वाली लगभग 21 फीसद महिलाएं 15 साल की उम्र से ही हिंसा झेली हैं. 15 साल से 19 साल के उम्र समूह की 41 फीसद लड़कियों ने 15 साल की उम्र से अपनी मां या सौतेली मां के हाथों शारीरिक हिंसा झेली हैं जबकि 18 फीसद ने अपने पिता या सौतेले पिता के हाथों शारीरिक हिंसा झेली है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जिन लड़कियों की शादी नहीं हुई, उनके साथ शारीरिक हिंसा करने वालों में पारिवारिक सदस्य, मित्र, जान-पहचान के व्यक्ति और शिक्षक थे. संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष तथा वाशिंगटन स्थित संस्था ‘इंटरनेशनल सेंटर पर रिसर्च ऑन वुमेन’(आईसीआरडब्ल्यु) से उद्घाटित हुआ है कि भारत में 10 में से 6 पुरुषों ने कभी न कभी अपनी पत्नी अथवा प्रेमिका के साथ हिंसक व्यवहार किया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि यह प्रवृत्ति उनलोगों में ज्यादा है जो आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक 52 फीसद महिलाओं ने स्वीकारा है कि उन्हें किसी न किसी तरह हिंसा का सामना करना पड़ा है. इसी तरह 38 फीसद महिलाओं ने घसीटे जाने, पिटाई, थप्पड़ मारे जाने तथा जलाने जैसे शारीरिक उत्पीड़नों का सामना करने की बात स्वीकारी है.
दरअसल महिलाओं के उत्पीड़नकर्ताओं के मन में सजा का भय ही नहीं है यही वजह है कि बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामलों में वृद्धि हो रही है. गौर करें तो बलात्कार के मामलों में सजा की दर बेहद कम है. आंकड़ें बताते हैं कि 2006 में यौन उत्पीड़न मामले में सजा की दर 51.8 फीसदी, 2007 में 49.9, 2008 में 50.5 और 2009 में 49.2 फीसद रही. इन आंकडों से साफ है कि बलात्कार के अधिकतर मामले में अपराधी सजा से बच जा रहे हैं. यानी महिलाओं पर होने वाले समग्र अत्याचारों में सजा केवल 30 फीसदी गुनाहगारों को ही मिल रही है. ऐसे में अगर बलात्कारियों और यौन उत्पीड़नकर्ताओं का हौसला बुलंद होता है तो यह अस्वाभाविक नहीं है.
इस समय देश में तकरीबन 95000 से अधिक बलात्कार के मुकदमें अदालतों में लंबित हैं. इनका निपटरा कब होगा भगवान जाने. भारत में हर एक घंटे में 22 बलात्कार के मामले दर्ज होते हैं. ये वे आंकड़े हैं जो पुलिस द्वारा दर्ज किए जाते हैं. अधिकांश मामले में तो पुलिस रिपोर्ट दर्ज करती ही नहीं है. दूसरी ओर लोकलाज के कारण भी ऐसे मामलों को पीड़िता के परिजनों द्वारा दबा दिया जाता है. जब तक यौन उत्पीड़न के मामले में शत-प्रतिशत गुनाहगारों को सजा नहीं मिलेगा तब तक ऐसे दुष्कृत्य थमने वाले नहीं हैं.

Thursday, May 12, 2016

जब स्तन ढकने के अधिकार के लिए काट दिए स्तन..

दिव्या आर्य

  • 9 घंटे पहले
दलित समुदाय की औरतेंImage copyrightGEORGE J THALIATH
नंगेली का नाम केरल के बाहर शायद किसी ने न सुना हो. किसी स्कूल के इतिहास की किताब में उनका ज़िक्र या कोई तस्वीर भी नहीं मिलेगी.
लेकिन उनके साहस की मिसाल ऐसी है कि एक बार जानने पर कभी नहीं भूलेंगे, क्योंकि नंगेली ने स्तन ढकने के अधिकार के लिए अपने ही स्तन काट दिए थे.
केरल के इतिहास के पन्नों में छिपी ये लगभग सौ से डेढ़ सौ साल पुरानी कहानी उस समय की है जब केरल के बड़े भाग में त्रावणकोर के राजा का शासन था.
जातिवाद की जड़ें बहुत गहरी थीं और निचली जातियों की महिलाओं को उनके स्तन न ढकने का आदेश था. उल्लंघन करने पर उन्हें 'ब्रेस्ट टैक्स' यानी 'स्तन कर' देना पड़ता था.
डॉ.शीबा
केरल के श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय में जेंडर इकॉलॉजी और दलित स्टडीज़ की एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. शीबा केएम बताती हैं कि ये वो समय था जब पहनावे के कायदे ऐसे थे कि एक व्यक्ति को देखते ही उसकी जाति की पहचान की जा सकती थी.
डॉ. शीबा कहती हैं, "ब्रेस्ट टैक्स का मक़सद जातिवाद के ढांचे को बनाए रखना था. ये एक तरह से एक औरत के निचली जाति से होने की कीमत थी. इस कर को बार-बार अदा कर पाना इन ग़रीब समुदायों के लिए मुमकिन नहीं था."
केरल के हिंदुओं में जाति के ढांचे में नायर जाति को शूद्र माना जाता था जिनसे निचले स्तर पर एड़वा और फिर दलित समुदायों को रखा जाता था.
दलित समुदायImage copyrightGEORGE J THALIATH
उस दौर में दलित समुदाय के लोग ज़्यादातर खेतिहर मज़दूर थे और ये कर देना उनके बस के बाहर था. ऐसे में एड़वा और नायर समुदाय की औरतें ही इस कर को देने की थोड़ी क्षमता रखती थीं.
डॉ. शीबा के मुताबिक इसके पीछे सोच थी कि अपने से ऊंची जाति के आदमी के सामने औरतों को अपने स्तन नहीं ढकने चाहिए.
वो बताती हैं, "ऊंची जाति की औरतों को भी मंदिर में अपने सीने का कपड़ा हटा देना होता था, पर निचली जाति की औरतों के सामने सभी मर्द ऊंची जाति के ही थे. तो उनके पास स्तन ना ढकने के अलावा कोई विकल्प नहीं था."
इसी बीच एड़वा जाति की एक महिला, नंगेली ने इस कर को दिए बग़ैर अपने स्तन ढकने का फ़ैसला कर लिया.
केरल के चेरथला में अब भी इलाके के बुज़ुर्ग उस जगह का पता बता देते हैं जहां नंगेली रहती थीं.
मोहनन नारायण
ऑटो चलाने वाले मोहनन नारायण हमें वो जगह दिखाने साथ चल पड़े. उन्होंने बताया, "कर मांगने आए अधिकारी ने जब नंगेली की बात को नहीं माना तो नंगेली ने अपने स्तन ख़ुद काटकर उसके सामने रख दिए."
लेकिन इस साहस के बाद ख़ून ज़्यादा बहने से नंगेली की मौत हो गई. बताया जाता है कि नंगेली के दाह संस्कार के दौरान उनके पति ने भी अग्नि में कूदकर अपनी जान दे दी.
नंगेली का जन्म स्थान
नंगेली की याद में उस जगह का नाम मुलच्छीपुरम यानी 'स्तन का स्थान' रख दिया गया. पर समय के साथ अब वहां से नंगेली का परिवार चला गया है और साथ ही इलाके का नाम भी बदलकर मनोरमा जंक्शन पड़ गया है.
बहुत कोशिश के बाद वहां से कुछ किलोमीटर की दूरी पर रह रहे नंगेली के पड़पोते मणियन वेलू का पता मिला.
मणियन
साइकिल किनारे लगाकर मणियन ने बताया कि नंगेली के परिवार की संतान होने पर उन्हें बहुत गर्व है.
उनका कहना था, "उन्होंने अपने लिए नहीं बल्कि सारी औरतों के लिए ये कदम उठाया था जिसका नतीजा ये हुआ कि राजा को ये कर वापस लेना पड़ा."
लेकिन इतिहासकार डॉ. शीबा ये भी कहती हैं कि इतिहास की किताबों में नंगेली के बारे में इतनी कम पड़ताल की गई है कि उनके विरोध और कर वापसी में सीधा रिश्ता कायम करना बहुत मुश्किल है.
नायर महिलाएंImage copyrightGEORGE J THALIATH
वो कहती हैं, "इतिहास हमेशा पुरुषों की नज़र से लिखा गया है, पिछले दशकों में कुछ कोशिशें शुरू हुई हैं महिलाओं के बारे में जानकारी जुटाने की, शायद उनमें कभी नंगेली की बारी भी आ जाए और हमें उनके साहसी कदम के बारे में विस्तार से और कुछ पता चल पाए."
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